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Are you also worried about getting sick again and again?

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दोस्तों कई बार आपने देखा होगा कि कई लोग थोड़े थोड़े दिनों में बीमार पड़ जाते हैं, वो आपके स्कूल के दोस्त हो सकते हैं, ऑफिस में आपके कलिग हो सकते हैं या आपके भाई, बहन, पड़ोसी कोई भी. लेकिन क्या आपको ये पता है कि बार-बार बीमार होने के कारण क्या होते हैं. तो दोस्तों बार-बार बीमार होने का मुख्य कारण शरीर की रोग प्रतिरोध क्षमता यानि कि इम्युनिटी सिस्टम का कमजोर होना होता है...तो आज के इस वीडियो में हम आपको बार-बार बीमार होने के कारणों और उससे बचने के उपायों के बारे में बताएँगे...

दोस्तों जब शरीर में किसी तरह का असंतुलन होता है तो शरीर खुद को अस्वस्थ महसूस करने लगता है. शरीर में यह असंतुलन किसी भी रूप में हो सकता है चाहे वो हार्मोनल इम्बेलेंस हो या पोषक तत्वों की कमी हो या मांसपेशियों से संबंधित हो. हमारे शरीर के सभी अंग प्राकृतिक रूप से रोगों से लड़ने में सक्षम होते हैं, जिसका मुख्य कारण होता है शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का‌, लेकिन उम्र के हिसाब से रोग प्रतिरोधक क्षमता सभी में कम-ज्यादा हो सकती है जो आपके बार-बार बीमार होने का एक सबसे मुख्य कारण है. इसके अलावा भी कई ऐसे कारण हैं जो आपको लगातार बीमार करते रहते हैं-

तो दोस्तों अगर शरीर में किसी भी विटामिन्स, प्रोटीन और पोषक तत्व की कमी होती है तो वह भी संबंधित अंग को प्रभावित कर सकता है. जैसे प्रोटीन की कमी से मांसपेशियां कमजोर होती हैं. वसा के ज्यादा होने से दिल कमजोर होने लगता है. आयरन की कमी होने से हिमोग्लोबिन की कमी होती है आदि ऐसे कई कारण हैं, जो शरीर को कमजोर करते हैं, जिससे व्यक्ति बीमार होता है या खुद को थका हुआ और बीमार महसूस करता है. दोस्तों बार बार बीमार पड़ने का एक कारण हार्मोन्स का असंतुलित होना भी होता है. शरीर के सभी अंगों के ठीक तरह से कार्य करने के लिए शरीर में हार्मोन का संतुलन होना भी आवश्यक है. अगर इन हार्मोन में किसी भी तरह का असंतुलन होता है तो व्यक्ति बीमार हो जाता है. हार्मोन्स बिगड़ने के कई कारण हो सकते हैं जैसे महिलाओं में 40 से अधिक उम्र होने पर हार्मोन्स में परिवर्तन होते रहते हैं. इसके अलावा अधिक तनावग्रस्त होने के कारण भी हार्मोन्स असंतुलित होते हैं. पैन्क्रियाज ग्रंथि के प्रभावित होने पर भी शरीर में प्राकृतिक रूप से इंसुलिन बनना बंद हो जाता है, जिससे डायबिटीज जैसी बीमारी पैदा हो जाती है. आमतौर पर हार्मोन असंतुलन की समस्या 40 वर्ष के बाद ही आती है, इसलिए इस उम्र में आते ही व्यवस्थित खानपान और जीवनशैली का ध्यान रखना चाहिए. इसके अलावा अनियमित दिनचर्या भी इसका एक मुख्य कारण होता है. कई लोगों की जीवन शैली इन दिनों व्यस्तता के चलते खराब हो गई है. नियमित व्यायाम नहीं करना, खानपान में गड़बड़ी, अधिक वसायुक्त आहार का सेवन करना, रातभर जागने के कारण कम नींद होना आदि सभी बीमारियों के मुख्य कारण होते हैं. इस कारण भी लोग बार-बार बीमार होते हैं.

तो दोस्तों अगर आप भी बार-बार बीमार होने की समस्या से परेशान है तो आपको अपने शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का मजबूत करने की ज़रूरत है.रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने के लिए दिनचर्या को बेहतर बनाना जरूरी है. इसके लिए अच्छा खानपान रखें. नियमित व्यायाम करने से भी इम्यून सिस्टम मजबूत होता है. भरपूर नींद लेने से भी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है.

तो दोस्तों आपको ये जानकारी कैसी लगी हमें कमेंट बॉक्स में कमेंट करके हमें अपनी राय ज़रूर दें. अगर आपको पोस्ट पसंद आई हो तो लाइक करें,साथ ही हमारे वेबसाईट को फॉलो करना न भूलें.

Psoriasis causes symptoms and treatment

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दोस्तों क्या आप सोरायसिस बीमारी के बारे में जानते हैं. ये त्वचा से जुड़ी एक बीमारी है। सोरायसिस रोग में त्वचा के ऊपर लाल धब्बा या पपड़ी-सी बन जाती है। पपड़ी में खुजली होती है। सोरायसिस की बीमारी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता के कमजोर होने के कारण होती है। दुनियाभर में सोराइसिस रोग से तीन फीसदी आबादी यानी करीब 12.50 करोड़ लोग प्रभावित हैं.
दोस्तों कई लोग सोराइसिस को अक्सर स्किन इंफेक्शन या कॉस्मेटिक प्रॉब्लम मान लेते हैं, जिसका आसानी से इलाज हो सकता है. लेकिन सोराइसिस इसके बिल्कुल उलट है. दरअसल, सोराइसिस रोग तभी होता है जब रोग प्रतिरोधक तंत्र स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला करता है. इससे त्वचा की कई कोशिकाएं बढ़ जाती है,
जिससे त्वचा पर सूखे और कड़े चकत्ते बन जाते हैं, क्योंकि त्वचा की कोशिकाएं त्वचा की सतह पर बन जाती हैं.

दोस्तों त्वचा पर होने वाले अन्य रोगों से अलग सोराइसिस नाम का रोग अति सक्रिय प्रतिरोधक प्रणाली से होता है, जिसमें शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली ही स्वस्थ कोशिकाओं और ऊतकों पर हमला करती है. सोराइसिस के सामान्य लक्षणों में शरीर के प्रभावित सामान्य अंगों में खुजली होती है. त्वचा पर पपड़ी जैसी ऊपरी परत जम जाती है. शरीर में लाल-लाल धब्बे और चकते हो जाते हैं. सोराइसिस का कोई संपूर्ण इलाज नहीं है, लेकिन सोइरासिस के लक्षणो की गंभीरता के बावजूद इसे काफी हद तक कंट्रोल किया या जा सकता है.

दोस्तों हेल्थ एक्सपर्ट का कहना है कि 'सोराइसिस के लक्षणों को हम अपने समाज में गंभीरता से नहीं लेते. बीमारी को नजरअंदाज करने और सोराइसिस रोग के संबंध में जागरूरकता की कमी से समय पर रोग का पता नहीं चल पाता और इस बीमारी के इलाज में काफी रुकावट आती है. त्वचा और शरीर पर होने वाले दूसरे रोगों का तो इलाज है, लेकिन सोराइसिस का कोई इलाज नहीं है. इसलिए सोराइसिस के लक्षणों के प्रति जागरूक रहना बहुत आवश्यक है और इसके कुछ खास लक्षणों को देखकर रोग के इलाज की प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए. अगर सोराइसिस का समय से और प्रभावी ढंग से इलाज न किया गया तो सोराइसिस से कई दूसरी सहायक बीमारियों का जन्म हो सकता है.

दोस्तों अगर आपको सोरायसिस हो जाए तो आपकों खाने पीने का खास ख्याल रखना होगा...इसलिए हम आपको बता रहे हैं कि अगर आपको सोरायसिस हो जाए तो क्या खाएँ और ख्या न खाएँ...

तो सबसे पहले बताते हैं की कौन कौन सी चीजे आप इस बीमारी में खा सकते हैं
तो आप अनाज में पुराना चावल, गेहूं, जौ दालों में अरहर, मूंग, मसूर दाल, फल और सब्जियों में सहजन, टिण्डा, परवल, लौकी, तोरई, खीरा, हरिद्रा, लहसुन, अदरक, अनार, जायफल आप खा सकते हैं.

अब आपको बताते हैं कि सोरायसिस की बीमारी में किन चीजों का परहेज करना चाहिए...तो दोस्तों इस बीमारी में नया धान, मैदा, चना दाल, मटर दाल, उड़द दाल, पत्तेदार सब्जियाँ, सरसों, टमाटर, बैंगन, नारंगी, नींबू, खट्टे अंगूर, आलू, कंद–मूल, दही, मछली, गुड़, दूध, अधिक नमक. कोल्ड्रिंक्स, संक्रमित/फफूंदी युक्त भोजन, अशुद्ध एवं संक्रमित जल खाने से बचे...लेकिन इसके अलावा कुछ अन्य चीजें ही जिन्हें बिलकुल भी नहीं खाना है इस लिस्ट में तैलीय मसालेदार भोजन, मांसहार और मांसाहार सूप, अचार, अधिक तेल, अधिक नमक, कोल्डड्रिंक्स, मैदे वाले पर्दाथ, शराब, फास्टफूड, सॉफ्टडिंक्स, जंक फ़ूड, डिब्बा बंद खाद्य पदार्थ, तला हुआ एवं कठिनाई से पाचन वाला भोजन. दोस्तों अगर आपको सोरायसिस नहीं भी है तो एक बात का खास ख्याल रखें कि कभी भी मछली और दूध का सेवन एक साथ न करें

तो दोस्तों आपको जानकारी कैसी लगी नीचे कमेंट बॉक्स में कमेंट करके हमें अपनी राय ज़रूर दें, साथ ही पोस्ट को लाइक करें और हमारे वेबसाईट को फॉलो जरूर करें.

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What happens with shaking feet??

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लोगों में जाने-अनजाने में कई आदतें ऐसी डेवलप हो जाती हैं जो आपकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाती हैं लेकिन आपको इसके बारे में खबर नहीं होती। जैसे नाखून चबाना, कुर्सी पर झूलना, कंधे उचकाना, बार-बार पलकें झपकाना या बैठे-बैठे पैर हिलाना। इसमें भी अगर आपमें बैठे-बैठे पैर हिलाने की आदत है तो आपको संभल जाना होगा। यह सिर्फ एक आदत नहीं बल्कि एक बीमारी है और इस बारे में लोगों को जानकारी ही नहीं है, की यह कितना खतरनाक हो सकता है तो हमारी इस वीडियो में हम आपको पैर हिलाने के पीछे का कारण बताते है .......!!

 

 

 

 

कई बार लोगों को अपनी इस अजीब आदत के बारे में ध्यान नहीं रहता कि वे बैठे-बैठे या लेटते समय पैर हिलाते हैं। लेकिन अगर आपको समझ आ गया हो कि आप भी इस आदत के शिकार हैं तो इस बीमारी को ठीक करने के लिए आपको कुछ चीजें करनी होगी और आप घर पर ही इसका इलाज कर सकते हैं।

 

रात में सोने के पहले या बिस्तर पर लेटे-लेटे पैर हिलाना ठीक नहीं है। पैर हिलाने वाले व्यक्ति के बारे में कहा जाता है कि यह अपने आप से ज्यादा अपने परिवारीजनों के बारे में ज्यादा सोचते हैं। ऐसा करने से व्यक्ति के नकारात्मक विचारों को ऊर्जा मिलती है, जो सकारात्मक सोच पर हावी हो जाती है। ऐसे व्यक्ति अपने काम में निराश रहता है।

जो व्यक्ति ज्यादा चिंता में रहता है,उसे इस पैर हिलाने की आदत हो जाती है। ज्यादातर लोग जिन्हें घर-परिवार की अधिक चिंता सताती है, वे सोते समय पैर हिलाते देखे जा सकते हैं।

 

यहां आपको सबसे पहले इस बीमारी के बारे में जानना होगा। 'रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम' एक नर्वस सिस्टम से जुड़ा रोग है और इसमें पैर हिलाने पर शरीर में डोपामाइन हार्मोन रिलीज होने लगता है। इसी कारण पैर हिलाते रहने पर व्यक्ति को अच्छा लगता है और बार-बार पैर हिलाने का दिल करता है। यह रोग अक्सर शरीर में आयरन की कमी के कारण होता है, जबकि वजन का ज्यादा होना, पर्याप्त नींद न लेना, व्यायाम ना करना, शराब और सिगरेट का अत्यधिक सेवन करना भी इसके मुख्य कारण हैं।

10 फीसदी लोगों में यह समस्या पाई जाती हैं। उम्र से इस बीमारी का कोई लेना देना नहीं है। लेकिन अधिकांश मामलों में देखा गया है कि यह रोग 35 वर्ष से अधिक की उम्र के व्यक्तियों में ज्यादा होता है। इसके लक्षण साफ तौर पर देखे जा सकते हैं जैसे पैरों में जलन, खुजली, कम्पन, दर्द, पैरों की रक्तवाहिनियों में बुलबुले युक्त पानी के भरे होने का एहसास होना इत्यादि।

ऐसे करें इलाज

 

 इसके इलाज से पहले अपनी एक आदत या लत को कंट्रोल करना जरूरी है। अगर आप शराब या सिगरेट का सेवन करते हैं तो बंद कर दे या इसका सेवन कम कर दें।

 इसके अलावा इस बीमारी का एक कारण पर्याप्त नींद ना लेना भी है। इसलिए कम से कम 7 या 8 घंटे की अच्छी नींद जरूर लें।

कैफीन युक्त पेय पदार्थ बिल्कुल ना पियें।

 अपनी डाइट में आयरन युक्त चीजें जैसे पालक, सरसों का साग, चुकंदर, केला, आदि शामिल करें।

 हल्के गुनगुने पानी में नहाने से भी इस समस्या को काफी हद तक टाला जा सकता है।

 ज्यादा से ज्यादा फलों और सब्जियों का सेवन करें।

पैरों की अच्छे से मसाज करने पर भी इस समस्या से निजात पाई जा सकती है।

रोजाना व्यायाम जरूर करें और प्रतिदिन मध्यम गति से पैदल चलना इस बीमारी के लिए बढ़िया व्यायाम है।अगर आपको भी यह बीमारी है तो सोने के पहले अपने घुटने के नीचे की, जांघों की और कूल्हों की माँसपेशियों को स्ट्रेच करें इससे लाभ होगा।

 

यह आदत स्वास्थ्य की दृष्टि से भी हानिकारक है। पैर हिलाने से घुटनों और जोड़ों के दर्द की समस्या हो जाती है। पैरों की नसों पर दबाव पड़ने से नुकसान होता है। इसी का बुरा प्रभाव दिल पर पड़ता है, जिससे हार्टअटैक का खतरा बढ़ने लगता है।

 

 

शोधकर्ता कहते हैं कि रातभर नींत नहीं आने की समस्या के कारण लोगों में यह आदत हो जाती है।

RLS से पीड़ित लोग नींद आने से पहले 250 से 300 बार अपना पैर हिला चुके होते हैं। इससे ब्लड प्रेशर और हार्ट बीट्स बढ़ती है। भविष्य में कार्डियोवेस्कुलर डिजीज़ की सबसे बड़ी वजह बनता है। इन सभी कारणों से इन आदतों को तुरंत ही बदल डालना चाहिए।

अगर आपको ज्यादा परेशानी हो तो डॉक्टर की सलाह लें।

 

 

 

 

 

वेल तो हम यही उम्मीद करते हैं कि आपको हमारी आज की यह जानकारी जरूर पसंद आई होगी साथ ही ऐसी और हेल्थ से जुड़ी तमाम समस्याओं का निजात पाने के लिए  आप हमारे  इस वेबसाईट से जुड़े रहिए साथ ही इसे लाइक और फॉलो करना ना भूले ताकि आने वाली अगली नोटिफिकेशन आप तक पहुंच सके ......!!

PUS Cell in Urine | क्या आपको पेशाब करते समय जलन और दर्द होता है? पेशाब में खून या मवाद आता है?

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क्या आपको पेशाब करते समय जलन और दर्द होता है? पेशाब में खून या मवाद आता है? बार-बार पेशाब करने का मन करता है, और जब पेशाब करते हैं तो पूरा पेशाब नहीं निकलता? अगर ऐसा है तो आपको सतर्क होने की ज़रूरत है, क्योंकि यह पेशाब में संक्रमण के लक्षण है। यूरिन में इन्फेक्शन अक्सर लोगों के लिए बड़ी परेशानी बन जाता है, क्योंकि लोग शर्म के कारण डॉक्टर के पास जाने से बचते हैं, लेकिन जब स्थिति हद से आगे बढ़ जाती है तो लोगों को डॉक्टर के पास जाना ही पड़ता है...इसलिए परेशानी को छिपाकर ज़्यादा बढ़ाने से बेहतर यह है कि आप डॉक्टर के पास जाएँ।

दोस्तों यूरिन इंफेक्शन एक ऐसी बीमारी है जो किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है, लेकिन यह पुरुषों की तुलना में महिलाओं में ज़्यादा होती है। और महिलाओं में भी 15 से लेकर 45 साल तक की महिलाओं में ये बीमारी ज़्यादा होती है। इस बीमारी में यूरिन के रास्ते में खुजली, जलन और सुई की चुभन की तरह असहनीय पीड़ा होती है, इसके साथ ही कई बार मूत्र के साथ मवाद और खून भी आता है, कई लोग शर्म या किसी और कारण से इस बीमारी को नज़रअंदाज करते हैं और इसका नतीजा यह होता है कि इस बीमारी को गंभीरता से नहीं लेने वाले 26 फीसदी लोगों में गुर्दे फेल होने का खतरा बढ़ जाता है।

तो इस बीमारी के बारे में आपके थोड़ी गहराई से बताते हैं। यूरिन इंफेक्शन दो प्रकार का होता है...एक साधारण यानि कि नॉर्मल इंफेक्शन, जो कभी कभी कम पानी पीने से भी हो जाता है. ऐसे में पानी की पूर्ति करके इसे खत्म किया जा सकता है. लेकिन दूसरा यानि कि असाधारण इंफेक्शन काफी खतरनाक होता है। असाधारण संक्रमण शुगर पेशंट, सिकेलसेल एनीमिया, पथरी के रोगियों, रेफ्लेक्स, बिस्तर पर मूत्र त्याग करने वाले बच्चों, एड्स के रोगियों तथा गुर्दा प्रत्यारोपण के रोगियों को होता है। ऐसे रोगियों में संक्रमण के कारण गुर्दा फेल होने और पूरे शरीर में जहर फैलने का भी खतरा होता है। इसलिए असाधारण इंफेक्शन का समय पर इलाज करवाना बेहद ज़रूरी है।

दोस्तों ज्यादातर संक्रमण जीवाणुओं के कारण होते हैं. और सिर्फ इंसान ही नहीं बल्कि सभी जीवों के यूरिन करने के स्थान पर ऐसे जीवाणु होते हैं जो उन्हें संक्रमण से बचाते हैं। इनमें लेक्टोबैसिलस, बैक्टीरायड्स, स्ट्रेप्टोकोकस प्रमुख हैं।

प्रवेश के कारण होते हैं। सभी जीवों के मूत्र-मार्ग में कुछ ऐसे जीवाणु निवास करते हैं जो लाभदायक होने के साथ-साथ संक्रमण होने से भी बचाते हैं। और किसी कारण से इन जीवाणुओं की संख्या कम हो जाती है तो कुछ दूसरे हानिकारण जीवाणु जैसे ई. कोलाई, क्लेबसेल्ला, प्रोटियस शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और इंफेक्शन को जन्म देते हैं। 

अब आपको बताते हैं कि इस तरह के इंफेक्शन होने पर जाँच कैसे और क्यों करवाना चाहिए। तो दोस्तों यूरिन इंफेक्शन होने का अंदेशा होने पर प्रयोगशाला में जाकर अपने मूत्र की जाँच करवाएँ। कुछ लोग पेशाब में मवाद आने को यूरिन इंफेक्शन समझ लेते हैं, जो कि सही नहीं है क्योंकि सिर्फ यूरिन इंफेक्शन के कारण ही पेशाब में मवाद नहीं आता है इसके कई कारण हो सकते हैं, जैसे गुर्दे की टी.बी. या शरीर के अंदर की कुछ अन्य बीमारियाँ।

अब आपको बताते हैं कि वो कौन-कौन से कारण हैं जिनकी वजह से यूरिन इंफेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है। 

तो इसका एक प्रमुख कारण वेस्टर्न स्टाइल की टॉयलेट सीट या अनहाईजेनिक टॉयलेट का इस्तेमाल करना हो सकता है। बहुत देर तक पेशाब रोककर रखने की आदत के कारण भी कई लोग यूरिन इंफेक्शन के शिकार हो जाते हैं। कई बार पथरी के रोगियों में यूरिन लाइन में पथरी के फंस जाने के कारण भी इंफेक्शन देखा जाता है। इसके अलावा गर्भावस्था में और कई बार कम इम्युनिटी वाले लोगों में भी ये देखा जाता है। इसके अलावा असुरक्षित यौन संबंधों, गर्भनिरोधक गोलियों और ज़्यादा एंटीबायोटिक दवाईयों के इस्तेमाल के कारण भी कई बार यूरिन इंफेक्शन की शिकायतें सामने आती है।

तो अगर आपको भी पेशाब में मवाद की समस्या है और आप यूरिन इंफेक्शन से परेशान है तो अपको जल्द से जल्द डॉक्टर से राय लेने की जरूरत है। इसी तरह के अन्य जानकारियों के लिए पोस्ट को लाइक और फॉलो करना न भूलें।

Effective ways to get rid of mental stress.

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आधुनिक जिंदगी में हर इंसान के पास तनाव बढ़ता जा रहा है, जिसकी वजह से एंग्जाइटी और डिप्रेशन जैसी बीमारियां जन्म ले रही है। किसी को ऑफिस का तनाव है, तो किसी को पैसे और नौकरी की चिंता है। ये परेशानियां आपका मानसिक स्ट्रेस बढ़ा रही हैं। आप जानते हैं कि ज्यादा सोचने, टेंशन लेने, तनाव, स्ट्रेस के कारण दिमाग पर बुरा असर पड़ता है, जिससे आप डिप्रेशन के शिकार हो सकते हैं। आप भी जिंदगी की मूलभूत जरुरतों को पूरा करने के लिए तनाव में रहते हैं तो अपनी इस परेशानी पर अंकुश लगाएं। हम आपको बताते हैं कि किन तरीकों को अपना कर आप मानसिक तनाव को कम कर सकते है, साथ हीै हम आपको यह भी बताएंगे की आखिर डिप्रेशन के क्या लक्षण है जिससे आप अपने एंग्जाइटी की परेशानी को दूर कर सकते हैं....!

 

 

पहले बात करते हैं एंजाइटी की जिसका लाइफ में होना  आज रोजमर्रा की जिंदगी में नॉर्मल माना जाता है क्योंकि आज  के रोजमर्रा की जिंदगी में हर कोई  परेशान और दो प्रसिद्ध होता है लेकिन ऐसी कंडीशन आपको हर दिन होती हो जिसमें आप परेशान रहते हो या आपको स्ट्रेस होता हो तो आप इसका जल्द से जल्द ट्रीटमेंट करवाएं ........!

 

जहां अगर एंजायटी के कारणों को देखा जाए तो अगर किसी ब्लड से रिलेटिव इंसान को एंजाइटी रहा है तो आपके माइंड में भी आता है क्या आपको भी एंजाइटी हो सकता है या फिर आप किसी लंबे समय से बीमारी से ग्रसित हो और ऐसे में भी एंजायटी डिप्रैशन देखने को मिलती है, एग्जांपल में जहां जब आपके घर में किसी मेंबर का देहांत हो जाना जिससे आप बेहद प्यार करते हैं  या फिर आपको किसी तरह का फोबिया या फीवर हो,जो काफी लंबे समय से है  जो आगे जाकर आपके पैनिक सिस्टम को एंजायटी या डिप्रेसिव बना सकता है ........और हार्ट के पेशेंट और डायबिटीज के लोगों में भी एक डिप्रेशन को देखा गया है जहां प्रेगनेंसी महिला में भी इन चीजों को देखा जाता है क्योंकि जब डिलीवरी का समय पास आता है तो ऐसे में उन्हें एंजायटी या डिप्रेशन का शिकार होना पड़ता है,हालांकि इन लोगों में आप किसी भी कारण को प्रूफ नहीं कर सकते कि उन्हें इन सभी चीजों की वजह से इन्हें एंजायटी डिप्रैशन  का शिकार होना पड़ रहा है इनके लिए कोई विशेष कारण सामान्य नहीं .......!!

 

 

अगर अब एंजायटी डिप्रैशन के लक्ष्ण की बात करें तो एंजायटी के पेशेंट में एक फोबिया या फिर पैनिक सिस्टम का बढ़ जाना  जिसमें घबरा जाना या फिर हार्टबीट तेज हो जाना  और कभी-कभी तो हाथ पैरों में भी लोगों के कंपन होने लगती है  और कई बार हम ऐसी बातें सुनते हैं जिससे हमारी जुबान भी लड़खड़ा ने लगती है नींद ना आना  शरीर में शक्ति ना लगना  अएनर्जी लेस करना इन सभी लक्षणों का होना यानी कि एंजायटी डिप्रैशन के कॉमन सिम्टेस मिलते हैं......!!

 

 

अगर बात करें गुस्सा और चिल्लाने की .....तो अगर आपके साथ कभी-कभी ऐसा होता है तो इसे एक मानसिक स्ट्रेस कह सकते हैं लेकिन अगर यही आप हर रोज कर रहे हैं तो आपको जल्द से जल्द किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाने की जरूरत है आप कहीं ना कहीं एंजाइटी डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं.......!!

 

 

हालांकि कॉमन बात तो यह है कि आज कल  टिन ऐज के बच्चे भी एंजाइटेक डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं जिसमें आपको स्कूल के बच्चे ज्यादा मिल जाएंगे क्योंकि आजकल जो स्कूल का इन्वायरमेंट है इसकी वजह से बच्चे थोड़े परेशान से रहते हैं साथ ही सोशल एनवायरमेंट की वजह से भी  बच्चे एंजायटी डिप्रैशन के शिकार होते हैं जहां सोसाइटी अगर आपको सरवाइज नहीं करने दे रही  तो बच्चों के मन में यह सभी बातें धीरे-धीरे घर कर जाती हैं और इस तरह बच्चे सोशल डिस्टेंसिंग पसंद करते हैं........ ऐसे में बच्चे धीरे-धीरे हर किसी से कनेक्ट नहीं कर पाते और वह पढ़ाई में मन नहीं लगा पाते और कहीं ना कहीं उनके मन में कई सारी परेशानियां चलने लगती है और यह सब चीजें बच्चों में आजकल काफी ज्यादा देखने को भी मिल रही है और अगर इसके लिए आप चाहते हैं कि आपके बच्चे भी इन सभी चीजों से दूर रहे तो पहले आप बच्चों को मेंटली सपोर्ट करें जहां बच्चों के लिए पैरंट्स की साइड से मेंटली सर्पोट काफी जरूरी होता है बच्चे ही नहीं बल्कि अगर आपकी फैमिली मेंबर में कोई सदस्य आप से कनेक्ट नहीं कर पा रहा और वह हर किसी से दूर रहना पसंद कर रहा है तो आप भी उनसे मेंटली कनेक्ट करे..... जिसमें एक्सरसाइज बेहद जरूरी होती है एक्सरसाइज करना दिमाग को स्वस्थ बनाए रखता है और इस दौरान उन्होंने हार्मोनिश होने शुरू होती है, और ऐसे में बच्चा या फिर कोई भी काफी अच्छा फील करता है........!

 

अब बात करते हैं एक होम्योपैथी ड्राप के बारे में जिसका प्रयोग एंजायटी डिप्रैशन और रिस्टलेसनेस यानी कि आपको घबराहट होती है या फिर आपको बेचैनी सी आती है जिसमें अगर आप किसी जॉब में है और आपको  काफी टास्क  दिया गया है और आप उसे पूरा नहीं कर पाते, या फिर आप बच्चे हैं और आप एग्जाम देने जा रहे हैं तो उन चीजों को आप याद नहीं कर पा रहे तो आपके लिए यह दबाव बेहद ही कारगर है जिसमें आप इसे टीनएज बच्चों को भी दे सकते हैं और एडल्ट भी इसे ले सकते हैं....... और यह ड्रॉप जर्मन की एडल्ट ब्रांड यानी ADEL 51  है....  जिसका उपयोग एग्जाटी डिप्रेशन के लिए कर सकते हैं जिसका रिजल्ट काफी अच्छा रहा है..... इस ड्रॉप  को आप किसी भी होम्योपैथी स्टोर से खरीद सकते हैं या फिर इसे आप ऑनलाइन भी मांगा सकते हैं साथ ही हम आपको इसके इस्तेमाल करने के उपाय भी बता दें जहां अगर आप एडल्ट हैं तो आप इसका इस्तेमाल 20 बूंद करें यानी कि अगर आपको ज्यादा स्ट्रेस लगता है तो आपको एक चौथाई कप पानी में 20 बूंद दवा डाल कर पीना है और इसे पूरे दिन में आपको तीन बार पीना है और आप इससे बैटर फील करे तो आप 15 ड्रॉप यूज कर सकते हैं जिसका आप को 1 से 2 महीने तक सेवन करना है जहां टीन ऐज के बच्चों की बात करें तो जहां अगर आप 15 साल से कम उम्र के बच्चे हैं तो आपको 7 ड्रॉप का इस्तेमाल करना है और आधा कप पानी में इसे इस्तेमाल करें और अगर 15 साल से ऊपर के बच्चे हैं तो आप 10 बूंद का इस्तेमाल कर सकते हैं और इन्हें भी इस दवा को पूरे दिन में दो से तीन बार लेना है साथ ही इसका इस्तेमाल एक से 2 मंथ तक करते रहना है.....!!

 

 

 

 

वेल तो हम यही उम्मीद करते हैं कि आपको हमारी यह वीडियो जरूर पसंद आई होगी...... साथ ही अगर आपको हेल्थ से जुड़ी ऐसी और जानकारी पानी हो तो आप हमारे इस वेबसाईट को फॉलो करना ना भूलें ताकि आने वाली अगली नोटिफिकेशन आप तक पहुंच सके और हेल्थ से जुड़ी बेहतरीन जानकारी भी आप प्राप्त कर सके.......!!

दांत में फ़्रैक्चर :आधा दांत टूटने और अनदेखा करने पर क्या होगा ?

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दोस्तों कई बार दांत टूटने को हम काफी सामान्य घटना मानते हैं, लेकिन हम आपको बता दें कि दांत का आधा टूटना या उसमें दरार आना कोई सामान्य घटना नहीं है. ऐसी कई स्थितियां हैं जिनसे दांत टूट सकता है, जैसे कोई कठोर भोजन चबाना, एक्सीडेंट के दौरान दांत पर कुछ लगना या फिर दांत पीसने की आदत के कारण भी दांत टूट सकता है। यदि आपके दांत का कोई छोटा हिस्सा टूट गया है, तो हो सकता है आपको किसी प्रकार का दर्द महसूस ना हो। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि दांत का थोड़ा बहुत हिस्सा टूटने से दांत की अंदरुनी नसें दिखाई नहीं देती। दांत के अंदरुनी हिस्से में नसों के ऊतक और रक्त वाहिकाएं होती हैं यदि इनमें सूजन या लालिमा आदि हो जाए तो असहनीय दर्द होने लग जाता है।

यदि आपका दांत टूट गया है या दांत में दरार आ गई है तो जल्द से जल्द डेंटिस्ट (दांतों के डॉक्टर) को दिखाना बहुत जरूरी होता है, ताकि डॉक्टर स्थिति की जांच कर सकें और आवश्यकता पड़ने पर इसका इलाज कर सकें। डॉक्टर आपके लक्षणों के आधार पर समस्या का पता लगाते हैं और आपके दांतों का परीक्षण करते हैं। भोजन के अलावा अपने दांतों के साथ किसी अन्य चीज को चबाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, जैसे पेन और बोतल का ढक्कन आदि। यदि आपको दांत पीसने आदत है, तो उससे छुटकारा पाने के लिए डॉक्टर की मदद लें।

टूटे हुए दांत के उपचार में दांत के गायब हुए हिस्से को एक विशेष प्रकार के पदार्थ के साथ भर दिया जाता है और यदि दांत का बड़ा हिस्सा टूट गया है तो दांत का एक आकार बनाकर उसे दांत पर लगा दिया जाता है, इसे क्राउन कहा जाता है। जैसे हड्डियां टूटने पर अपने आप जुड़ जाती हैं, दांत ऐसा नहीं कर पाते। यहां तक कि अगर समय पर इलाज ना किया जाए तो कुछ प्रकार की दरारें बढ़ने लग जाती हैं। लगातार दरार बढ़ने के कारण अंत में पूरा दांत निकल जाता है।

तो दोस्तों आपको ये वीडियो कैसा लगा, नीचे कमेंट बॉक्स में कमेंट करके हमें अपनी राय ज़रूर दें. अगर आपको वीडियो अच्छा लगा तो वीडियो तो लाइक करें, साथ ही हमारे वेबसाईट को फॉलो करना न भूलें.